एशियन फुटबॉल की सबसे बड़ी प्रतिद्वंदिता जहां सबसे ऊपर पर होती है देशभक्ति

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साउथ कोरिया और जापान की टीमें

एशियन फुटबॉल में साउथ कोरिया (South Korea) और जापान (Japan) के बीच प्रतिद्वंदिता काफी कड़ी मानी जाती है

नई दिल्ली. एशियन फुटबॉल में आज तक की सबसे बड़ी प्रतिद्वंदिता साउथ कोरिया (South Korea) और जापान (Japan) के बीच मानी जाती है. यह दोनों ही देश पिछले कुछ समय में एशिया (Asia) की सबसे कामयाब फुटबॉल टीम बनकर सामने आई हैं लेकिन जब दोनों आमने-सामने होते हैं तब खेल का मैदान जंग का मैदान बन जाता है.

एक दूसरे के खिलाफ जीत इन दोनों देशों के लिए कितनी जरूरी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब साल 2012 ओलिंपिक (2012 Olympic) में साउथ कोरिया (South Korea) ने जापान (Japan) को हराकर ब्रॉन्ज मेडल जीता तो देश की सरकार ने टीम के खिलाड़ियों को आर्मी ट्रेनिंग से मुक्त कर दिया. आपको बता दें कि साउथ कोरिया में यह सेना ट्रेनिंग भी के लिए जरूरी है.  दोनों देशों के बीच खेले जाने वाले फुटबॉल मैच को कोरियन में हानजिलियोन कहा जाता है वहीं जापान में इसे निक्कासेन (Nikkassen) कहा जाता है.

जापान औऱ साउथ कोरिया के बीच मुकाबलों का रिकॉर्ड
जापान (Japan) और साउथ कोरिया (South Korea) के बीच अब तक कुल 79 फुटबॉल मैच खेले गए हैं. इनमें से साउथ कोरिया ने 42 मैच जीते हैं वहीं जापान (Japan) केवल 14 ही मैच जीत पाया है. वहीं 23 मकाबले ड्रॉ रहे हैं. दोनों देशों के बीच प्रतिद्वंदिता की शुरुआत हुई थी 1954 से. जापान ने युद्ध के बाद पहली बार भारत में हुए 1951 में हुए एशियन गेम्स (Asian Games) में हिस्सा लिया था. फिर वह फीफा से जु़ड़ा लेकिन क्वालिफाई नहीं कर पाया. पहले फीफा क्वालिफिकेशन राउंड में दो मैचों के बाद उसका सामना साउथ कोरिया से हुआ. दोनों के बीच यह पहला मुकाबला सात मार्च 1954 को खेला गया जहां साउथ कोरिया ने 5-1 से बड़ी जीत हासिल की थी.साउथ कोरिया अब तक कुल 10 बार औऱ लगातार नौ बार फीफा वर्ल्ड कप में हिस्सा ले चुकी है जो कि एशिया में सबसे ज्यादा है. वहीं जापान ने पिछले छह फीफा वर्ल्ड कप में हिस्सा लिया है. साउथ कोरिया अब तक 1956 और 1960 में दो बार एशियन कप जीत चुकी हैं वहीं जापान ने चार बार इस खिताब पर कब्जा किया है. आपकों बता दें कि जापान पहला गैर अमेरिकी देश देश है जिसने कोपा अमेरिका में हिस्सा लिया.

क्या है इस दुश्मनी का इतिहास
जापान ने 1910 से 1945 के बीच कोरियाई उपमहाद्वीप को अपना उपनिवेश बनाकर रखा था. 35 साल के जापानी राजशाही शासन के दौरान जापानी नीतियों ने कोरियाई इतिहास एवं संस्कृति को ताक पर रख दिया और कोरियाई जनता को दमनकारी श्रम तथा यौन दासता के लिए मजबूर किया. साल 1965 में संधि की गई जिसके बाद कोरिया जापान से अलग हो गया. दोदक्षिण कोरिया 1993 में तानाशाही शासन का चोला उतारकर पूरी तरह असैन्य सरकार द्वारा शासित राष्ट्र बन गया, जो जापान के खिलाफ जनता की शिकायतों के प्रति अधिक संवेदनशील था. इस कारण जापान के खिलाफ शिकायतें और दुश्मनी मुखर हुई हैं.

दोनों देशों में एक दूसरे के प्रति कितनी नफरत है इसका खुलासा बीबीसी ने अपने एक पोल में किया.  इस पोल के मुताबिक जापान की केवल 13 प्रतिशत जनता ही साउथ कोरिया को लेकर सकारात्मक सोच रखते हैं वहीं 37 प्रतिशत उसे अपना दुश्मन मानते हैं. वहीं साउथ कोरिया में जापान से नफरत करने वालों की संख्या 79 प्रतिशत है जो कि चीन के बाद जापान का नापसंद करने वाला दूसरा देश हैं. यही वजह है कि दोनों टीमों के बीच फुटबॉल मैच हमेशा एक जंग का रूप ले लेता है.

फुटबॉल मैदान में खिलाड़ी ले आए राजनीति
साल 2012 में साउथ कोरिया ने ओलिंपिक खेलों (Olympic Games) में जापान को 2-0 से मात देकर ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया था. इस मुकाबले से पहले साउथ कोरिया के कोच म्यूंग -बो-होंग ने कहा था ‘जाओ उन्हें तबाह कर दो’. ऐसा हुआ भी साउथ कोरिया ने जीत हासिल की. जीत के बाद फीफा और आईओसी ने कोरियन खिलाड़ी जोंग-वू-पार्क पर राजनीतिक संदेश दिखाने का आरोप लगाया और उनसे ब्रॉन्ज मेडल ले लिया गया. पार्क को सम्मान समारोह में हिस्सा लेने की भी इजाजत नहीं थी. जापान पर जीत के बाद पार्क अपनी टी-शर्ट उतारकर हाथ में प्लेकार्ड लेकर उतरे थे. इस कार्ड पर लिखा था, ‘डोकडो हमारा है’. आपको बता दें कि दोनों देशों के बीच विवादित जगह है. साउथ कोरिया में आईओसी के इस कदम का बहुत विरोध हुआ था.

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First published: May 6, 2020, 12:28 PM IST





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